शिक्षा और आनापान

आदर्श रूप से बच्चों की शिक्षा में उनके बौद्धिक, शारीरिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक विकास का समन्वय होना चाहिए | परन्तु आज थोड़े बहुत खेल और शारीरिक शिक्षण को छोड़, शिक्षा प्रमुख रूप से शैक्षणिक उपलब्धियों पर ही केंद्रित हैं | बच्चों के भावनात्मक और आध्यात्मिक विकास को कम महत्व दिया जाता है |


शिक्षा के दो महत्वपूर्ण आयाम हैं : बुद्धि और कौशल्य विकास, जिनके द्वारा बाहरी दुनिया का ज्ञान प्राप्त होता है और व्यक्तिगत विकास, जो स्वयं को जानने से होता है | बाहर की दुनिया का ज्ञान बच्चे को कौशल्य विकास में मदद करता है, जो अंत में भरणपोषण में काम आता है | स्वयं का ज्ञान या व्यक्तिगत विकास, बच्चे को जीने की कला सीखने में मदद करता है, जिससे वे सकारात्मक कार्यों और सामंजस्यपूर्ण संबंधों पर आधारित एक संतुलित और सफल जीवन जी सकें |


भारत में आनापान ध्यान का एक प्रारंभिक सत्र


बच्चे को एक सफल आजीविका के लिए अपने कौशल्य का विकास करना जरूरी होता है, परन्तु अगर हम स्वयं के आतंरिक विकास को नजरंदाज कर दें, तो हम एक ऐसे समाज के निर्माण में सहायक हो सकते हैं जहाँ क्रोध, हिंसा, व्याकुलता, दुःख और समाज द्रोही कार्यों का बोलबाला है |


अधिकांशतः पालकों और शिक्षकों को यह ज्ञात होता है कि हमारी शिक्षा में कोई कमी है, पर वे यह नहीं जानते कि इस बारे में क्या करना चाहिए | क्योंकि अधिकांश देशों में एक धर्मनिरपेक्ष सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली है, बच्चों के व्यक्तिगत विकास और सम्पूर्ण विकास को बढ़ावा देने का आधार गैर-सांप्रदायिक होना चाहिए |


आनापान ध्यान द्वारा आतंरिक शिक्षा
एक ऐसी शिक्षा प्रणाली जरूरी है जो बच्चों के व्यक्तिगत विकास को प्रोत्साहन दे और एक परिपक्व और संतुलित व्यक्तिमत्व को विकसित करने में मदद करे | यह प्रणाली एक ऐसी बुध्धिमत्ता को बढ़ावा देगी जो आत्म-जागरूकता और आत्म-ज्ञान से पैदा होती है | इसे किताबों से नहीं सीखा जा सकता बल्कि अनुभव के स्तर पर आत्मसात किया जा सकता है |


आदर्श रूप से यह प्रणाली एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण और एक आध्यात्मिक अभिप्राय के साथ आत्मसात की जाएगी | यहाँ "आध्यात्मिक" का अर्थ है, वह सच्चा आध्यात्मिक मन जो किसी विशेष पंथ, समूह, धर्म या संगठित विश्वास प्रणाली से स्वतंत्र है |


बच्चों के आनापान ध्यान शिविरों के अनुभव से हम जानते हैं कि जब उन्हें एक विशेष वातावरण में अपने अन्दर की यात्रा का पहला कदम लेना सिखाया जाता है, तो उनके अन्दर ठोस बदलाव आते हैं |


इन शिविरों का केंद्रबिंदु आनापान ध्यान है | संक्षेप में, यह तकनीक हमें इस क्षण में जीना सिखाती है और धीरे धीरे बच्चों के मन से विकार और नकारात्मकताएं निकाल देती है |


भारत में आनापान ध्यान का एक प्रारंभिक सत्र


आनापान ध्यान एक सरल, गैर-सांप्रदायिक तकनीक है | इसमें स्वाभाविक श्वसन के बारे में जागरूकता शामिल है, जिसका अर्थ है कि इसे बिना विवाद दुनिया के किसी भी हिस्से के बच्चों को, किसी भी पृष्ठभूमि में, सफलतापूर्वक सिखाया जा सकता है | बच्चों को सिर्फ अपनी नासिका के प्रवेश द्वार पर ध्यान केंद्रित कर आनेवाली सांस और जानेवाली सांस को देखना सीखना है | वे सांस के प्रवाह को बदलने या सही करने की कोशिश किए बिना अपनी स्वाभाविक सांस का निरीक्षण करते हैं | इस तरह वे आत्मज्ञान की पहली सीढ़ी का अनुभव करते हैं |


जैसे जैसे वे निरीक्षण करते हैं वे वर्तमान में रहना सीखते हैं | मन धीरे धीरे शांत और एकाग्र हो जाता है | यह प्रक्रिया एक बार शुरू हो जाए तो उसका कोई अंत नहीं होता | वर्तमान में संतुलित तरीके से रहने की क्षमता जीवन के हर पल को विकास की ओर ले जाती है |


बाल शिविरों का प्रबंधन
जो बच्चे, एक दो या तीन दिवसीय आनापान शिविरों में आते हैं वे एक पूर्व निर्धारित समय सारिणी जिसमे ध्यान और अन्य गतिविधियों का समावेश होता है, का पालन करते हैं | इसका ध्येय ध्यान को बच्चों के लिए दिलचस्प बनाना है | बातचीत से उनकी स्वाभाविक जिज्ञासा तृप्त होती है | बाल शिक्षक जो एक विपश्यना साधक होता है, छोटे समूहों में बच्चों को मार्गदर्शन देता है | लगातार मार्गदर्शन से यह फायदा होता है कि बच्चे साधना के सार को समझ पाते हैं | पूरी समय सारिणी इसी उद्देश्य से बनायी गयी है कि वह ध्यान के लिए पूरक हो |


ध्यान सत्र आधे आधे घंटे के होते हैं | बीच बीच में समूह में चर्चा, खेल और अन्य गतिविधियों का समावेश होता है, जिसका प्रमुख उद्देश्य प्रत्येक बच्चे में मौलिकता की अभिव्यक्ति को प्रोत्साहित करना है | इसलिए ध्यान के वास्तविक अभ्यास के साथ, बच्चे विभिन्न गतिविधियों में भाग लेते हुए अपने व्यावहारिक मूल्यों को अनुभव से समझते हैं |


इंग्लैंड में एक बाल शिविर के दौरान रचनात्मक गतिविधियाँ


प्रत्यक्ष अनुभव, एक धर्मनिरपेक्ष भावना और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित कर, बच्चे अपने मन का मालिक बनने की कला सीखते हैं | वे सीखते हैं कि सांस, मन और शरीर के बीच की एक कड़ी है और सांस की गति हमारी मनस्थिति से बहुत गहरा संबंध रखती है | समय और अभ्यास से बच्चे क्रोध, भय और व्याकुलता जैसी असंतुलित मनस्थितियों से बाहर आ जाते हैं |


नित्य अभ्यास से आनापान साधना भी किसी अन्य साधना की तरह हमारे जीवन का हिस्सा बन जाती है | मन सकारात्मक और सजग हो जाता है जिससे बच्चा अपने दैनंदिन जीवन की चुनौतियों का मुकाबला करने में समर्थ हो जाता है |


बाल शिविरों की वर्तमान कार्य प्रणाली कई सालों के व्यवहारिक अनुभव से बनी है | आदर्श रूप से विभिन्न उम्र समूहों के लिए तीन दिवसीय शिविर ध्यान केन्द्रों पर ही लगते हैं | अनुभव से यह देखा गया है कि आवासीय शिविर आठ से ऊपर की उम्र के बच्चों के लिए उपयुक्त होते हैं | इसे ध्यान में रखते हुए निम्नलिखित समूह बनाए गए हैं :


छोटे बच्चे : आयु ८ से १२ साल
बड़े बच्चे : आयु १३ से १६ साल ( कुछ देशों में १८ साल तक भी)


१८ वर्ष की आयु के बाद बच्चे इस लायक समझे जाते हैं कि वे पूरे दस दिनों का शिविर कर सकेंगे | हर पार्श्वभूमी के बच्चे इन आनापान शिविरों में भाग ले सकते हैं | ऐसे बच्चे जिनके परिवार में कोई विपश्यना साधक है या आनापान साधना उनकी शाला के कार्यक्रम का एक भाग है , उन्हें विशेष रूप से प्रोत्साहन दिया जाता है | यह इसलिए कि साधना और उसके फायदे और भी मजबूत हो जाते हैं अगर यह बच्चे के जीवन का एक अंग हो |


जबकि बच्चों के लिए तीन दिवसीय आनापान शिविर विपश्यना केंद्रों पर आयोजित किया जाता है, एक या दो दिवसीय आवासीय शिविर स्कूलों में आयोजित किए जाते हैं | किसी विद्यालय में शिविर लगाने के लिए एक महत्वपूर्ण शर्त यह है कि स्कूल में कम से कम एक शिक्षक ऐसा हो जिसने दस दिन का विपश्यना शिविर किया है | इसके अलावा, यह बेहतर होगा कि विद्यालय में ध्यान अभ्यास के लिए दिन में १० – १५ मिनट का समय अलग से रखा जाए |

मलेशिया में विपश्यना केंद्र के तमिल स्कूल समूह के लिए शिविर


कुछ अनुभव
हैदराबाद, भारत में एक स्कूल में, आनापान शिविर नियमित रूप से फरवरी १९९१ से आयोजित किए गए हैं | प्रत्येक वर्ष ३ री कक्षा (८ वर्ष) के बच्चों को सर्वप्रथम ध्यान सिखाया जाता है, और अब ३ री, ४ थी और ५ वी के वर्ग के बच्चे नियमित रूप से ध्यान कर रहे हैं | वे सुबह स्कूलसभा के बाद पांच मिनट और शाम को घर जाने से पहले पांच मिनट के लिए ध्यान करते हैं | पहले मुख्याध्यापक और कुछ शिक्षकों को संदेह था कि केवल पांच मिनट का ध्यान कैसे फायदेमंद हो सकता है, परन्तु वे यह जान कर आश्चर्यचकित हुए कि बच्चों का व्यवहार कितना बेहतर हुआ |


भारत में सुबह स्कूलसभा में ध्यान


बच्चों के व्यवहार और शैक्षणिक उपलब्धियों में परिवर्तनों का मूल्यांकन करने के लिए पालक और कक्षा शिक्षकों को प्रश्नावली भेजी गई | प्रश्नावली के उत्तरों से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि बच्चे सब से पहले अपने सामाजिक व्यवहार में सुधार करते हैं | नकारात्मक गुण जैसे कठोर शब्दों का प्रयोग, कक्षा में विध्वन्सकारक बर्ताव और हीन भाव, कम होने लगते हैं | इसके साथ ही, परोपकारी होना, स्वच्छता और आत्मविश्वास की वृद्धि जैसे सकारात्मक गुण बढ़ने लगते हैं | स्मरणशक्ति, एकाग्रता और पढाई में भी सुधार आता है |


आनापान ध्यान बच्चों के आध्यात्मिक और भावनात्मक जीवन को समृद्ध करेगा | इसके अलावा, यह एक व्यावहारिक, गैर सांप्रदायिक तकनीक है जो सभी को लाभ दे सकती है, चाहे उनकी सांस्कृतिक या धार्मिक पृष्ठभूमी कोई भी हो | हर जगह बच्चों को इस अभ्यास से लाभ होगा ऐसी आशा है |

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