विशेष आवश्यकताओं के लिए आनापान ध्यान शिविर

नीचे बाल शिविर शिक्षकों ने (बा.शि.शि.) बच्चों के आनापान शिविरों के वृत्तान्त दिए हुए हैं | उनकी पार्श्वभूमियां कुछ इस प्रकार से हैं :

म्यांमार (बर्मा) में मूकबधिर बच्चों की पाठशालाएं
मूकबधिर बच्चे भारत में
अंध बच्चे म्यांमार में
म्यांमार की कुछ संस्थाएं
मलेशिया में अनाथालय
म्यांमार में कुष्ठ रोग से पीड़ित गांव
म्यांमार में “नरगिस” चक्रवात से प्रभावित क्षेत्र

 

 

म्यांमार (बर्मा) में मूकबधिर बच्चों की पाठशालाएं
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मूकबधिर बच्चे मांडले पाठशाला में

२००६ में म्यांमार में मूकबधिर बच्चों के लिए पहला शिविर आयोजित किया गया था |

३० जुलाई को, "मूक बधिर बच्चों के लिए युवा विकास केंद्र", चानीमाथेजि क्वार्टर, मांडले, म्यांमार, में १०४ छात्रों ने भाग लिया | श्री. गोयन्का जी के आनापान निर्देश टेप का उपयोग, ध्यान कक्ष में एक अच्छा माहौल प्रदान करने और उन वयस्कों के लिए जो सुन सकते थे, किया गया | गोयन्का जी के निर्देशों के मुख्य भाग पॉवर पॉइंट प्रदर्शन द्वारा प्रस्तुत किए गए थे, जो केंद्र के बाल शिविर शिक्षकों द्वारा सांकेतिक भाषा में समझाये
गये |

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पॉवर पॉइंट और सांकेतिक भाषा का उपयोग मूकबधिर बच्चों को अनुदेश देने के लिए मांडले में

२० छात्रों के छोटे समूहों को बाल शिविर शिक्षकों (बा.शि.शि.) और युवा विकास केंद्र से एक शिक्षक द्वारा निर्देश दिए गए और बच्चों की जांच की गई | फ्लिप चार्ट की सहायता से निर्देश दिए गए | बच्चे जानते थे जब सीसीटी ने फर्श पर आघात किया या पंक्ति के कोने वाले एक बच्चे को छुआ और उसके बाद पूरी पंक्ति में लगातार हर बच्चे ने अपने बगल के बच्चे को छूना जारी रखा, तब ध्यान के बाद अपनी आंखें खोलने का समय हो गया | विशेष आवश्यकताओं वाले बच्चों के लिए यह पहला शिविर एक महत्वपूर्ण और यादगार मील का पत्थर था |

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मैरी चैपमैन स्कूल, यांगून के छात्र

दूसरा ऐसा शिविर ४ नवंबर, २००६ को "मैरी चैपमैन स्कूल फॉर डेफ", डागॉन, यांगून, म्यांमार में मूकबधिर बच्चों के लिए था | उसमे १०३ छात्र थे |
वही सीखने सिखाने की कार्यप्रणाली अपनाई गयी | फर्क सिर्फ छात्रों की पार्श्वभूमियों
में था | मांडले के छात्र बुध्द धर्म के अनुयायी थे जबकि मैरी चैपमैन स्कूल के अधिकांश छात्र और शिक्षक इसाई धर्म को मानने वाले थे, फिर भी समान निर्देशों का उपयोग किया गया | जनवरी २००८ में तीसरे शिविर का आयोजन उसी स्कूल में १११ छात्रों के साथ किया गया |

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मूकबधिर बच्चों को निर्देश देने के लिए चित्रों का उपयोग

बाल शिविर शिक्षक (बा.शि.शि.) वृत्तान्त: "हम लोग साशंक थे क्योंकि पहली बार मूकबधिर बच्चों के साथ प्रयोग कर रहें थे | बहुत सारी शंकाएं थीं, पर बच्चों की ओर से बहुत उत्साह था | गोयन्का जी के प्रोत्साहन की वजह से हम ने देखा कि छात्रों ने पूरे जोश से साथ भाग लिया और अच्छी तरह अभ्यास भी किया | हम लोग आश्वस्त हुए और ख़ुश भी कि हम बच्चों के साथ संवाद साध सके | उनकी ख़ुशी ऊँची आवाजों और सांकेतिक भाषा में जाहिर हो रही थी |"

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म्यांमार में मूकबधिर बच्चे अपनी ख़ुशी जाहिर करते हुए

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मूकबधिर बच्चे भारत में

पूना में एक शिक्षक जिन्हें मूकबधिर बच्चों के साथ काम करने का १५ सालों का अनुभव था, उन्हें गोयन्का जी ने ऐसे बच्चों का शिविर लेने के लिया प्रोत्साहित किया | इसके लिए स्थानीय विपश्यना केंद्र, धम्मपुन्न के कुछ शिक्षक कुछ महीनों के लिए उनकी शाला में जा कर सांकेतिक भाषा एवं मूकबधिर बच्चों को सिखाने के लिए लगने वाले साधनों के उपयोग में प्रशिक्षित हुए |

शाला के उस शिक्षक को भी बाल शिविर शिक्षक का प्रशिक्षण दिया गया और उनके छात्रों के लिया पहला शिविर २००६ में वहां के स्थानीय केंद्र में लिया गया | उसमें २७, बड़ी उम्र के युवा बच्चे सम्मिलित हुए | उनके अभिविन्यास के लिए “कम्पास” यह वीडियो और ८० लोगों का एक चालू शिविर दिखाया गया, जिसके बाद उन्हें प्रारंभिक सूचनाएं दी गयीं |

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पूना केंद्र, भारत में मूकबधिर युवा

आगे के शिविरों में उन्हें अधिक विस्तार से सूचनाएं दी गयीं और छोटे समूहों में बातचीत | गोयन्का जी की हिंदी सूचनाओं का टेप पार्श्वभूमी में लगा था और बाल शिविर शिक्षक उन्हें स्थानीय भाषा, मराठी में, मुद्रित संकेत दिखा रहा था | मैत्री भावना के सत्र के बाद स्वयंसेवकों की आखों में आँसू थे | गोयन्का जी के गाने के साथ ही बच्चे भी उनकी अपनी शैली में सहभागी हुए |

उसके बाद से ही एक वीडियो बनाया गया है जिस में उनके बाल शिविर शिक्षक मराठी सांकेतिक भाषा में सूचना देते हैं | हर नए सत्र के बाद बच्चे और पूरी टीम इस में अधिकाधिक दक्ष होते गए | अब तक २० से अधिक शिविरों का आयोजन हो चुका है, जिनमें अब छोटी उम्र के बच्चों को भी लिया जाने लगा है | २००९ में केंद्र पर एक बड़े कक्ष का निर्माण हुआ, जिससे बड़े समूहों में शिविर आयोजित करना संभव हो सका है | जनवरी में इच्छुक समूहों के लिए भी एक वीडियो तैयार किया गया |

इसके लिए लगने वाले साधनों और खर्च के लिए पूना की टीम को अमरीका से दान प्राप्त हुआ | सांकेतिक भाषा सार्वभौमिक नहीं होती | हर देश की भाषा अलग होती है | जब मराठी सांकेतिक भाषा का कार्य पूर्ण होगा तो अलग अलग पार्श्वभूमियों और भाषाओं के लिए ऐसे प्रयोग करना आसन हो जायेगा |

पूना, भारत में चल रहें मूकबधिर बच्चों के शिविर का वीडियो:

Flash Player का इस्तेमाल करें |

डाउनलोड वीडियो: संक्षिप्त (६१ MB) | बड़ा (१७८ MB)

सर्वाधिकार, विपश्यना रिसर्च इंस्टिट्यूट

मूकबधिर बच्चों के लिए “कामक हायस्कूल”, मदुराई, तमिलनाडु में भी, तमिल में लिखे गये सूचना फलकों की मदद से शिविर का आयोजन किया गया | यहाँ अधिकांश बच्चे बहुत गरीब और अशिक्षित परिवारों से थे | यह कोशिश सचमुच चुनौतीपूर्ण थी |

यहां ४० बच्चे एक दिवसीय शिविर में और ४९ युवा २ दिवसीय शिविर में थे | ब्लैकबोर्ड और सांकेतिक भाषा द्वारा शाला के शिक्षकों ने शिविर संचालन करने वाले आचार्यों को छात्रों के साथ संवाद स्थापित करने में मदद की | सत्र की शुरुआत और समाप्ति के लिए एक ढ़ोल का उपयोग किया गया |

बच्चों के शारीरिक हावभाव से स्पष्ट था कि उन्हें शिविर का सार समझ में आया और ध्यान सत्रों से शांति मिली |

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अंध बच्चे म्यांमार में
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यांगों म्यांमार में अंध बच्चों के लिए आनापान शिविर

जुलाई २००५ में “की मिन दिन अन्धशाला” के छात्रों के लिए पहला आनापान शिविर आयोजित किया गया | बच्चे बहुत प्रोत्साहित हुए | उनकी दृष्टी कम थी पर वे बुद्धिमान थे और ज्ञान, कौशल्य और प्रज्ञा में कम पड़ना नहीं चाहते थे | ध्यान शिक्षक ने उन्हें आश्वासन दिया: "हालांकि भौतिक स्तर पर आपकी दृष्टि कमजोर है, आप उच्च बौद्धिक और आध्यात्मिक दृष्टि, ध्यान के उचित अभ्यास द्वारा प्राप्त कर सकते हैं | जिन लोगों के पास अच्छी भौतिक दृष्टि है, वे भी अज्ञान के अंधेरे में रह सकते हैं | वे खुद को और दूसरों को हानिकारक विचारों, भाषण और कार्यों से नुकसान पहुंचा सकते हैं | पर आप प्रज्ञा का प्रकाश अनुभव कर सकते हैं और एक फलदायी और स्वस्थ जीवन जी सकते हैं |

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म्यांमार में स्वयंसेवक अंध बच्चों को ध्यान कक्ष में अपनी जगह खोजने में मदद करते हुए

शुरू में, उन्हें उन सभी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा जो सभी ध्यान सीखने वालों को आती है , जैसे भटकने वाला मन, व्याकुलता, शारीरिक दर्द, नींद आना आदि | परन्तु प्रोत्साहन और मार्गदर्शन से वे अंत में सफल हुए |

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म्यांमार में अंध बच्चों के एक शिविर के बाद

उनकी कुछ टिप्पणियां इस प्रकार हैं :

“पहले मैं हमेशा क्रोधित रहता था और मेरा मन अव्यवस्थित, अब मैं नाराज नहीं होता हूँ | मैं हलका और खुश महसूस करता हूँ |”

“मुझे बहुत इच्छा है कि मैं अपने पालकों को भी यह सीखा सकूँ जिससे उन्हें भी बहुत लाभ होगा |”

“अब मुझे जीवन में आशा की एक किरण दिखाई पड़ती है | मैं अब दुखी या उदास नहीं हूँ |”

“शुरुआत में मुझे लगा कि हम साधना नहीं कर पाएंगे क्योंकि हम देख नहीं सकते | पर अब मैं जान गया हूँ कि हम यह कर सकते हैं !”

“हमें प्रकाश मिल गया है ! अब हम अंधकार में नहीं हैं |”

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म्यांमार की कुछ संस्थाएं

समाज कल्याण विभाग के तहत विभिन्न संस्थाओं ने बच्चों के लिए शिविर आयोजित किए हैं | वे ऐसे बच्चों के लिए काम करते हैं जो अनाथ, परित्यक्त या समस्याग्रस्त हैं या अपराधी हैं |

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नेट-ऑ-सान, म्यांमार यह एक अपराधी बच्चों के लिए जो सजा भुगत रहें हैं, एक प्रशिक्षण केंद्र है | सामाजिक सुरक्षा मंत्रालय के अन्य प्रशिक्षण केंन्द्रों से भी बच्चों को नेट-ऑ-सान में भेजा जाता हैं, अगर वे काबू से बाहर हों या १८ साल की आयु के ऊपर | नेट-ऑ-सान के एक शिक्षक का कहना है “निश्चित रूप से हम बच्चों में फर्क देख सकते हैं | जो बच्चे काबा ए प्रशिक्षण केंद्र, जहाँ आनापान (सांस देखना) सिखाया जाता है, से आते हैं उन्हें आसानी से काबू में रखा जा सकता है | वे नेट-ऑ-सान के बच्चों, जिन्हें यह नहीं सिखाया जाता, से ज्यादा विनम्र होते हैं | मुझे ख़ुशी है की अब नेट-ऑ-सान के बच्चों को भी इस प्रकार के शिविर में भाग लेने का अवसर मिलेगा और वे उसका लाभ ले सकेंगे |

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Cसमाज कल्याण विभाग म्यांमार द्वारा संचालित युवकों की प्रशिक्षण शाला में आयोजित एक शिविर

इन्सेन केन्द्रीय कारागृह यांगों में आयोजित पहले विपश्यना शिविर की समाप्ति के पश्चात, २७ जुलाई २००८ को वहाँ १६९ युवा पुरुष बंदियों के लिए आनापान शिविर का आयोजन किया गया | १२ शिक्षक और २ धम्म सेवकों ने सेवा दी | युवाओं की प्रतिक्रियाएं दिल को छू लेने वाली थीं |

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मलेशिया में अनाथालय

तमन मेगाह अनाथालय, कुआला लम्पुर में अनाथ, विकलांग और परित्यक्त बच्चों को रखा जाता है | यहाँ तीन साधारण उपनगरीय आवासों में बच्चों को रखा गया है और बच्चों को सुरक्षा और प्यार देने के लिए मुख्यत: स्वयंसेवकों की मदद ली जाती है | सभी जातियों के बच्चे यहाँ हैं परन्तु च्यूंकि यह अनाथालय एक तमिल दंपत्ति द्वारा शुरू किया गया था, सभी बच्चे तमिल बोल सकते हैं |

इसलिए यहाँ दिसंबर २००६ में एक सिंगापूर के बाल शिविर शिक्षक द्वारा तमिल भाषा में एक दिवसीय आनापान शिविर का आयोजन किया गया था | यहाँ बच्चों की शारीरिक, मानसिक और सामाजिक क्षमता में एक व्यापक विविधता है | फिर भी करीब १० बच्चों को इस लायक पाया गया कि वे इस शिविर को समझ कर इसमें भाग ले सकेंगे | शिक्षक बच्चों के साथ अच्छी तरह संवाद स्थापित कर सका और उनकी प्रगति से ख़ुश हुआ | चूंकि मलेशिया में विभिन्न भाषाएँ प्रचलित है, शिविर का आयोजन करने वाले स्वयंसेवक बच्चों से विविध भाषाओं में बात करते रहे |

मई २००८ में, इसी अनाथालय के बच्चों को, “ती रत्ना” अनाथालय में, एक दिवसीय शिविर के लिए आमंत्रित किया गया | इसका आयोजन “सीरामस” के एक सामुदायिक केंद्र में जहाँ नियमित रूप से आनापान शिविर होते हैं, किया गया था | ४० बच्चों ने इसमें भाग लिया |

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सीरामस, कुआला लम्पुर में तमिल बच्चों का एक शिविर

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म्यांमार में कुष्ठ रोग से पीड़ित गांव

मई २००७ में सगैंग, उपरी म्यांमार में स्थित म्यायादनार नामक गाँव की प्राथमिक पाठशाला में पहला बच्चों का आनापान शिविर आयोजित किया गया | यहाँ १६० कुष्ठ रोग से पीड़ित परिवारों को अलग रखा गया है | काफ़ी स्थलान्तारों के बाद १९९२ में वे इस गाव में बस गए |

१९९७ में यहाँ बच्चों के लिए प्राथमिक शाला बनायी गयी और २००६ में इसे सरकारी शाला के रूप में प्रशासकीय मान्यता और सहायता प्राप्त हुई |

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उपरी म्यांमार में स्थित कुष्ठ रोग से पीड़ित गांव की प्राथमिक शाला

एक छोटा क्लिनिक यहाँ कार्य करता है, और बच्चों को रोग प्रतिरोध के लिए नि: शुल्क उपाय किए जाते हैं | उनके माता-पिता बीमारी के एक उन्नत चरण में हैं और कुछ में विकृतियाँ भी हैं | उनका भी इलाज होता है | पर जो भी पहले से विकृत हैं उन्हें हमेशा ठीक नहीं किया जा सकता | वे स्वाभाविक रूप से हीनबोध से ग्रस्त होते हैं और जीवित रहने के लिए उनका काम ज्यादातर कचरा एकत्र करने या ऐसे सामाना बेचने जिसका रिसायकलिंग हो सके, तक सीमित होता है |

१ दिन के आनापान शिविर टीम का नेतृत्व डॉ. सॉ म्या यी और डाव विन की, यांगून द्वारा किया गया | शिविर पूर्व परामर्श स्कूल के खुले मैदान में किया गया | गोयन्का जी के निर्देशों को सुनने के लिए उन्हें हॉल में जगह दी गई जहाँ उन्होंने निर्देशानुसार आनापान सति का अभ्यास किया |

निर्देशों के बाद, उन्हें छोटे समूहों में, बाल शिविर शिक्षक द्वारा जांच और परामर्श के लिए एकत्रित किया गया | इसके बाद वे वापस हॉल में सामूहिक साधना के लिए एकत्रित हुए |

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कुष्ठ रोग से पीड़ित गांव की प्राथमिक शाला में प्रश्नोत्तर सत्र

 

दोपहर के ३ बजे उन्होंने आखिरी सामूहिक साधना की और उसके बाद मैत्री ध्यान हुआ | बच्चों के चेहरे ख़ुशी से खिल उठे थे | उन्हें मिले प्यार का एहसास था और मदद कर सकने के कारण शिक्षक भी बहुत खुश थे |

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म्यांमार में “नरगिस” चक्रवात से प्रभावित क्षेत्र

२ और ३ मई २००८ में आये चक्रवात के बाद जहाँ जहाँ जनहानि , इमारतों की टूटफूट और खाना पानी के उपलब्धता में रूकावट आयी थी, राहतकर्मी मदद करने के लिए पहुंचे | बा.शि.शि. की एक टीम स्थानीय साधकों के साथ मिलकर इन क्षेत्रों में दान करने और सहायता करने में कार्यरत थी | इसके अलावा वे छह, एक दिवसीय बाल शिविरों का आयोजन करने में सफल रहे | इसमें जून और जुलाई के दौरान प्रभावित गांवों के १०१० युवा छात्रों ने भाग लिया | इससे गहरी भय और चिंताओं की पीड़ा को कम करने, बच्चों के मनोबल को बढ़ावा देने, और उनके मन को मजबूत करने में मदद मिली |


“नरगिस” चक्रवात से प्रभावित क्षेत्र में आयोजित शिविरों के स्लाइड शो
(नीचे तस्वीर पर क्लिक करें)


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